उत्तर प्रदेश संग्रहालय निदेशालय
संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश


राजकीय बौद्ध संग्रहालय, पिपरहवां (सिद्धार्थनगर)

राजकीय बौद्ध संग्रहालय, पिपरहवां (सिद्धार्थनगर)

भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित प्रमुख स्थलों में से एक इस स्थल की पहचान प्राचीन कपिलवस्तु के रूप में की जाती है। प्राचीन काल में कपिलवस्तु शाक्यों की राजधानी थी तथा भगवान बुद्ध के पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के प्रमुख थे। छठी शताब्दी ईसापूर्व के दस प्रमुख गणराज्यों में इसकी गणना की जाती थी। इस स्थल पर भगवान बुद्ध का बाल्यकाल व्यतीत हुआ था तथा राजकुमार सिद्धार्थ के रूप में 29 वर्ष की अवस्था में सत्य की खोज के लिये उन्होंने यहां से प्रस्थान किया। बौद्ध साहित्य में इस बात का उल्लेख है कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके अस्थि अवशेषों को आठ भागों में विभक्त किया गया था, जिसका एक भाग शाक्यों को भी प्राप्त हुआ था। यहां का मुख्य स्तूप मूल रूप से शाक्यों द्वारा भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेषों के अपने भाग पर निर्मित किया गया था। यहां पर सर्वप्रथम पुरातात्विक कार्य प्रारम्भ करने का श्रेय डब्ल्यू0 सी0 पेप्पे को है। उत्खनन के परिणामस्वरूप यहां स्थित स्तूप से एक धातु मंजूषा प्राप्त हुई थी, जिस पर ब्राह्मी में लेख है-सुकिति-भतिनं स भगिनिकनम स-पुत-दलनं, इयं सलिल निधने बुधस भगवते सकियानं। अर्थात इस स्तूप का निर्माण उनके शाक्य भाईयों द्वारा अपनी बहनों, पुत्रों एवं पत्नियों के साथ मिलकर किया गया था। यहां से प्राप्त मृण मृदाओं पर ‘‘देव पुत्र विहारे कपिलवस्तु भिक्खु संघस’’ तथा ‘‘महा कपिलवस्तु भिक्खुसंघस’’ अंकित है। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह स्थल प्राचीन कपिलवस्तु का बौद्ध प्रतिष्ठान था।

भगवान बुद्ध की स्मृतियों से जुड़ा होने के कारण यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय महत्व का है। इस क्षेत्र में यत्र-तत्र बिखरी कला सम्पदा एवं देश के अन्य भागों से प्राप्त कलाकृतियों का संकलन, संरक्षण, अभिलेखीकरण, शोध एवं प्रदर्शन कर जन सामान्य को इसके गरिमामय इतिहास की जानकारी प्राप्त कराने के बहुउद्देश्य से बौद्ध हेरिटेज सेन्टर, पिपरहवा, सिद्धार्थ नगर के अन्तर्गत बौद्ध संग्रहालय एवं प्रशासनिक भवन कला वीथिका सहित अनेक परियोजनाओं का शिलान्यास वर्ष 1997 में मा0 मुख्यमंत्री जी, उ0 प्र0 के कर कमलों द्वारा किया गया था। शासन द्वारा दिये गये निर्देश के क्रम में संग्रहालय/प्रशासनिक भवन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, भारत सरकार को दिनांक 03 अक्टूबर, 2009 को हस्तांतरित कर दिया गया है।

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